اعتذار..
أيا نفسي..
اعتذاري إليكِ..
إليكِ اعتذار..
أسَرْتُكِ قسْراً..
ظلمتُكِ جهراً
بحلمٍ تحقّقْ..
لفكرة...وأبدعْ..
ضلَلْتُ الطّريقَ
ظنَنْتُ الحياةَ..
متاعاً ..وهزلاً
وأطربُ لهواً..
أميسُ بشِعري ..
أميدُ وأسكرْ..
ونشوى أنا ..!
وشابكة تأسرْ..
عقلي و روحي..
ودون اعتدال ..
وقتي زوال ..
ضياعٌ ..وأكثرْ..
وفوضى أنا...!
أيا نفسي ..عُذْراً
تقوقعْتُ..فكراً
سلوْتُ بعيداً..
عنكِ..ومنكِ..
وأنتِ الحياة..
ينابيعُ سلسل..
وهمسٌ لجدولْ..
ورودٌ ومخملْ..
وخَلْقٌ مُكمَّلْ..
برسمٍ عظيمّ..
وفنُّهُ ..أذْهَلْ..
تعالي..تعالي..
هنا الابتهالْ..
فنورُ الإلهِ..
صلاةٌ ..عبادة
وفجرٌ ونجمٌ..
وشمسٌ...سناء
ودنيا خيال..
وبعثٌ..ولادة..
جبالٌ..تُعانقْ..
وتصحو عنادل
وتثغو خرافٌ بحلمٍ وديعِ
يتوهُ الجمالُ..
بسحرِ يرافقْ
حكايا لعشقٍ..
تطوفُ المجال..
وغيمٌ ..وغيثٌ..
اعذريني..نفسي
كيفَ حرَمْتُكِ..
هذي الحقيقة..
وذاكَ الجمال؟؟
هناكَ انطلاقٌ..
هناكَ انبعاثٌ..
تنفّسَ صبحٌ..
ويغفو المساءْ..
تنحَّ قليلاً..
وابعدْ كثيراً..
أيُّها الجوّال..
لنفسي اعتذار..
كانون الثاني ٢٠١٩م
جوليا دومنا
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